मंगलवार, 12 जुलाई 2011
गुरुवार, 7 अप्रैल 2011
nirmla
नौ
|
मं
|
साराम के जाने से घर सूना हो गया। दोनों
छोटे लड़के उसी स्कूल में पढ़ते थे। निर्मला रोज उनसे मंसाराम का हाल पूछती। आशा
थी कि छुट्टी के दिन वह आयेगा, लेकिन जब छुट्टी के
दिन गुजर गये और वह न आया, तो निर्मला की तबीयत
घबराने लगी। उसने उसके लिए मूंग के लड्डू बना रखे थे। सोमवार को प्रात: भूंगी का
लड्डू देकर मदरसे भेजा। नौ बजे भूंगी लौट आयी। मंसाराम ने लड्डू ज्यों-के-त्यों
लौटा दिये थे।
निर्मला
ने पूछा-पहले से कुछ हरे हुए हैं, रे?
भूंगी-हरे-वरे
तो नहीं हुए, और सूख गये हैं।
निर्मला-
क्या जी अच्छा नहीं है?
भूंगी-यह
तो मैंने नहीं पूछा बहूजी, झूठ क्यों बोलूं? हां, वहां का कहार मेरा देवर लगता है । वह
कहता था कि तुम्हारे बाबूजी की खुराक कुछ नहीं है। दो फुलकियां खाकर उठ जाते हैं, फिर दिन भर कुछ नहीं खाते। हरदम पढ़ते
रहते हैं।
निर्मला-तूने
पूछा नहीं, लड्डू क्यों लौटाये
देते हो?
भूंगी-
बहूजी, झूठ क्यों बोलूं? यह पूछने की तो मुझे
सुध ही न रही। हां, यह कहते थे कि अब तू
यहां कभी न आना, न मेरे लिए कोई चीज
लाना और अपनी बहूजी से कह देना कि मेरे पास कोई चिट्ठी-पत्तरी न भेजें। लड़कों से
भी मेरे पास कोई संदेशा न भेजें और एक ऐसी बात कही कि मेरे मुंह से निकल नहीं सकती,
फिर रोने लगे।
निर्मला-कौन
बात थी कह तो?
भूंगी-क्या
कहूं कहते थे मेरे जीने को धीक्कार है? यही कहकर रोने लगे।
निर्मला
के मुंह से एक ठंडी सांस निकल गयी। ऐसा मालूम हुआ, मानो
कलेजा बैठा जाता है। उसका रोम-रोम आर्तनाद करने लगा। वह वहां बैठी न रह सकी। जाकर
बिस्तर पर मुंह ढांपकर लेट रही और फूट-फूटकर रोने लगी। ‘वह भी जान गये’। उसके अन्त:करण में
बार-बार यही आवाज़ गूंजने लगी-‘वह
भी जान गये’। भगवान् अब क्या
होगा? जिस संदेह की आग में
वह भस्म हो रही थी, अब शतगुण वेग से
धधकने लगी। उसे अपनी कोई चिंता न थी। जीवन में अब सुख की क्या आशा थी, जिसकी उसे लालसा होती? उसने अपने मन को इस
विचार से समझाया था कि यह मेरे पूर्व कर्मों का प्रायश्चित है। कौन प्राणी ऐसा
निर्लज्ज होगा, जो इस दशा में बहुत
दिन जी सके? कर्त्तव्य की वेदी
पर उसने अपना जीवन और उसकी सारी कामनाएं होम कर दी थीं। हृदय रोता रहता था, पर मुख पर हंसी का रंग भरना पड़ता था।
जिसका मुंह देखने को जी न चाहता था, उसके सामने हंस-हंसकर
बातें करनी पड़ती थीं। जिस देह का स्पर्श
उसे सर्प के शीतल स्पर्श के समान लगता था, उससे आलिंगित होकर
उसे जितनी घृणा, जितनी मर्मवेदना होती
थी, उसे कौन जान सकता है? उस समय उसकी यही
इच्छा थी कि धरती फट जाये और मैं उसमें समा जाऊं। लेकिन सारी विडम्बना अब तक अपने
ही तक थी। अपनी चिंता उसन छोड़ दी थी, लेकिन वह समस्या अब
अत्यंत भयंकर हो गयी थी। वह अपनी आंखों से मंसाराम की आत्मपीड़ा नहीं देख सकती थी।
मंसाराम जैसे मनस्वी, साहसी युवक पर इस
आक्षेप का जो असर पड़ सकता था, उसकी कल्पना ही से
उसके प्राण कांप उठते थे। अब चाहे उस पर कितने ही संदेह क्यों न हों, चाहे उसे आत्महत्या ही क्यों न करनी
पड़े, पर वह चुप नहीं बैठ
सकती। मंसाराम की रक्षा करने के लिए वह विकल हो गयी। उसने संकोच और लज्जा की चादर
उतारकर फेंक देने का निश्चय कर लिया।
वकील
साहब भोजन करके कचहरी जाने के पहले एक बार उससे अवश्य मिल लिया करते थे। उनके आने
का समय हो गया था। आ ही रहे होंगे, यह सोचकर निर्मला
द्वार पर खड़ी हो गयी और उनका इंतजार करने लगी लेकिन यह क्या? वह तो बाहर चले जा
रहे है। गाड़ी जुतकर आ गयी, यह हुक्म वह यहीं से
दिया करते थे। तो क्या आज वह न आयेंगे, बाहर-ही-बाहर चले
जायेंगे। नहीं, ऐसा नहीं होने पायेगा।
उसने भूंगी से कहा-जाकर बाबूजी को बुला ला। कहना, एक
जरुरी काम है, सुन लीजिए।
मुंशीजी
जाने को तैयार ही थे। यह संदेशा पाकर अंदर आये,
पर
कमरे में न आकर दूर से ही पूछा-क्या बात है भाई? जल्दी कह दो, मुझे एक जरुरी काम से जाना है। अभी
थोड़ी देर हुई, हेडमास्टर साहब का एक
पत्र आया है कि मंसाराम को ज्वर आ गया है, बेहतर हो कि आप घर ही
पर उसका इलाज करें। इसलिए उधर ही से हाता हुआ कचहरी जाऊंगा। तुम्हें कोई खास बात
तो नहीं कहनी है।
निर्मला
पर मानो वज्र गिर पड़ा। आंसुओं के आवेग और कंठ-स्वर में घोर संग्राम होने लगा।
दोनों पहले निकलने पर तुले हुए थे। दो में से कोई एक कदम भी पीछे हटना नहीं चाहता
था। कंठ-स्वर की दुर्बलता और आंसुओं की सबलता देखकर यह निश्चय करना कठिन नहीं था
कि एक क्षण यही संग्राम होता रहा तो मैदान किसके हाथ रहेगा। अखीर दोनों साथ-साथ
निकले, लेकिन बाहर आते ही बलवान
ने निर्बल को दबा लिया। केवल इतना मुंह से निकला-कोई खास बात नहीं थी। आप तो उधर
जा ही रहे हैं।
मुंशीजी-
मैंने लड़कों पूछा था, तो वे कहते थे, कल बैठे पढ़ रहे थे, आज न जाने क्या हो गया।
निर्मला
ने आवेश से कांपते हुए कहा-यह सब आप कर रहे हैं
मुंशीजी
ने त्योरियां बदलकर कहा-मैं कर रहा हूं? मैं क्या कर रहा हूं?
निर्मला-अपने
दिल से पूछिए।
मुंशीजी-मैंने
तो यही सोचा था कि यहां उसका पढ़ने में जी नहीं लगता, वहां और लड़कों के साथ खामाख्वह पढ़ेगा
ही। यह तो बुरी बात न थी और मैंने क्या किया?
निर्मला-खूब सोचिए, इसीलिए आपने उन्हें वहां भेजा था? आपके मन में और कोई
बात न थी।
मुंशीजी
जरा हिचकिचाए और अपनी दुर्बलता को छिपाने के लिए मुस्कराने की चेष्टा करके बोले-और
क्या बात हो सकती थी? भला तुम्हीं सोचो।
निर्मला-खैर, यही सही। अब आप कृपा करके उन्हें आज ही
लेते आइयेगा, वहां रहने से उनकी
बीमारी बढ़ जाने का भय है। यहां दीदीजी जितनी तीमारदारी कर सकती हैं, दूसरा नहीं कर सकता।
एक
क्षण के बाद उसने सिर नीचा करके कहा-मेरे कारण न लाना चाहते हों, तो मुझे घर भेज दीजिए। मैं वहां आराम से
रहूंगी।
मुंशीजी
ने इसका कुछ जवाब न दिया। बाहर चले गये, और एक क्षण में गाड़ी
स्कूल की ओर चली।
मन।
तेरी गति कितनी विचित्र है, कितनी रहस्य से भरी
हुई, कितनी दुर्भेद्य। तू
कितनी जल्द रंग बदलता है?
इस कला में तू निपुण है। आतिशबाजी की चर्खी को भी रंग बदलते कुछ देरी लगती है, पर तुझे रंग बदलने में उसका लक्षांश समय
भी नहीं लगता। जहां अभी वात्सल्य था, वहां फिर संदेह ने आसन जमा लिया।
वह
सोचते थे-कहीं उसने बहाना तो नहीं किया है?
गुरुवार, 31 मार्च 2011
निर्मला 8
आठ
|
ज
|
ब कोई बात हमारी आशा के विरुद्ध होती है, तभी दुख होता है। मंसाराम को निर्मला से
कभी इस बात की आशा न थी कि वे उसकी शिकायत करेंगी। इसलिए उसे घोर वेदना हो रही थी।
वह क्यों मेरी शिकायत करती है?
क्या चाहती है? यही न कि वह मेरे
पति की कमाई खाता है, इसके पढ़ान-लिखाने
में रुपये खर्च होते हैं, कपड़ा पहनता है। उनकी
यही इच्छा होगी कि यह घर में न रहे। मेरे न रहने से उनके रुपये बच जायेंगे। वह
मुझसे बहुत प्रसन्नचित्त रहती हैं। कभी मैंने उनके मुंह से कटु शब्द नहीं सुने।
क्या यह सब कौशल है? हो सकता है? चिड़िया को जाल में
फंसाने के पहले शिकारी दाने बिखेरता है। आह। मैं नहीं जानता था कि दाने के नीचे
जाल है, यह मातृ-स्नेह केवल
मेरे निर्वासन की भूमिका है।
अच्छा, मेरा यहां रहना क्यों बुरा लगता है? जो उनका पति है, क्या वह मेरा पिता नहीं है? क्या पिता-पुत्र का
संबंध स्त्री-पुरुष के संबंध से कुछ कम घनिष्ट है? अगर मुझे उनके संपूर्ण आधिपत्य से
ईर्ष्या नहीं होती, वह जो चाहे करें, मैं मुंह नहीं खोल सकता, तो वह मुझे एक अगुंल भर भूमि भी देना
नहीं चाहतीं। आप पक्के महल में रहकर क्यों मुझे वृक्ष की छाया में बैठा नहीं देख
सकतीं।
हां, वह समझती होंगी कि वह बड़ा होकर मेरे
पति की सम्पत्ति का स्वामी हो जायेगा, इसलिए अभी से निकाल
देना अच्छा है। उनको कैसे विश्वास दिलाऊं कि मेरी ओर से यह शंका न करें। उन्हें
क्योंकर बताऊं कि मंसाराम विष खाकर प्राण दे देगा, इसके
पहले कि उनका अहित कर। उसे चाहे कितनी ही कठिनाइयां सहनी पडें वह उनके हृदय का शूल
न बनेगा। यों तो पिताजी ने मुझे जन्म दिया है और अब भी मुझ पर उनका स्नेह कम नहीं
है, लेकिन क्या मैं इतना
भी नहीं जानता कि जिस दिन पिताजी ने उनसे विवाह किया, उसी दिन उन्होंने हमें अपने हृदय से बाहर
निकाल दिया? अब हम अनाथों की
भांति यहां पड़े रह सकते हैं, इस घर पर हमारा कोई
अधिकार नहीं है। कदाचित् पूर्व संस्कारों के कारण यहां अन्य अनाथों से हमारी दशा
कुछ अच्छी है, पर हैं अनाथ ही। हम
उसी दिन अनाथ हुए, जिस दिन अम्मां जी
परलोक सिधारीं। जो कुछ कसर रह गयी थी, वह इस विवाह ने पूरी
कर दी। मैं तो खुद पहले इनसे विशेष संबंध न रखता था। अगर, उन्हीं दिनों पिताजी से मेरी शिकायत की
होती, तो शायद मुझे इतना
दुख न होता। मैं तो उसे आघात के लिए तैयार बैठा था। संसार में क्या मैं मजदूरी भी
नहीं कर सकता? लेकिन बुरे वक्त में
इन्होंने चोट की। हिंसक पशु भी आदमी को गाफिल पाकर ही चोट करते हैं। इसीलिए मेरी
आवभगत होती थी, खाना खाने के लिए
उठने में जरा भी देर हो जाती थी, तो बुलावे पर बुलावे
आते थे, जलपान के लिए प्रात:
हलुआ बनाया जाता था, बार-बार पूछा जाता
था-रुपयों की जरूरत तो नहीं है?
इसीलिए वह सौ रुपयों की घड़ी मंगवाई थी।
मगर
क्या इन्हें क्या दूसरी शिकायत न सूझी, जो मुझे आवारा कहा? आखिर उन्होंने मेरी
क्या आवारगी देखी? यह कह सकती थीं कि
इसका मन पढ़ने-लिखने में नहीं लगता, एक-न-एक चीज के लिए
नित्य रुपये मांगता रहता है। यही एक बात उन्हें क्यों सूझी? शायद इसीलिए कि यही
सबसे कठोर आघात है, जो वह मुझ पर कर सकती
हैं। पहली ही बार इन्होंने मुझे पर अग्नि–बाण चला दिया, जिससे कहीं शरण नहीं।
इसीलिए न कि वह पिता की नजरों से गिर जाये? मुझे बोर्डिंग-हाउस में रखने का तो एक बहाना था। उद्देश्य यह
था कि इसे दूध की मक्खी की तरह निकाल दिया जाये। दो-चार महीने के बाद खर्च-वर्च
देना बंद कर दिया जाये, फिर चाहे मरे या
जिये। अगर मैं जानता कि यह प्रेरणा इनकी ओर से हुई है, तो कहीं जगह न रहने पर भी जगह निकाल
लेता। नौकरों की कोठरियों में तो जगह मिल जाती,
बरामदे
में पड़े रहने के लिए बहुत जगह मिल जाती। खैर,
अब
सबेरा है। जब स्नेह नहीं रहा, तो केवल पेट भरने के
लिए यहां पड़े रहना बेहयाई है, यह अब मेरा घर नहीं।
इसी घर में पैदा हुआ हूं, यही खेला हूं, पर यह अब मेरा नहीं। पिताजी भी मेरे
पिता नहीं हैं। मैं उनका पुत्र हूं, पर वह मेरे पिता नहीं
हैं। संसार के सारे नाते स्नेह के नाते हैं। जहां स्नेह नहीं, वहां कुछ नहीं। हाय, अम्मांजी, तुम
कहां हो?
यह
सोचकर मंसाराम रोने लगा। ज्यों-ज्यों मातृ स्नेह की पूर्व-स्मृतियां जागृत होती
थीं, उसके आंसू उमड़ते आते
थे। वह कई बार अम्मां-अम्मां पुकार उठा, मानो वह खड़ी सुन रही
हैं। मातृ-हीनता के दु:ख का आज उसे पहली बार अनुभव हुआ। वह आत्माभिमानी था, साहसी था, पर
अब तक सुख की गोद में लालन-पालन होने के कारण वह इस समय अपने आप को निराधार समझ
रहा था।
रात
के दस बज गये थे। मुंशीजी आज कहीं दावत खाने गये हुए थे। दो बार महरी मंसाराम को
भोजन करने के लिए बुलाने आ चुकी थी। मंसाराम ने पिछली बार उससे झुंझलाकर कह दिया
था-मुझे भूख नहीं है, कुछ न खाऊंगा।
बार-बार आकर सिर पर सवार हो जाती है। इसीलिए जब निर्मला ने उसे फिर उसी काम के लिए
भेजना चाहा, तो वह न गयी।
बोली-बहूजी, वह मेरे बुलाने से न आवेंगे।
निर्मला-आयेंगे
क्यों नहीं? जाकर कह दे खाना
ठण्डा हुआ जाता है। दो चार कौर खा लें।
महरी-मैं यह सब कह के
हार गयी, नहीं आते।
निर्मला-तूने
यह कहा था कि वह बैठी हुई हैं।
महरी-नहीं
बहूजी, यह तो मैंने नहीं कहा, झूठ क्यों बोलूं।
निर्मला-अच्छा, तो जाकर यह कह देना, वह बैठी तुम्हारी राह देख रही हैं। तुम
न खाओगे तो वह रसोई उठाकर सो रहेंगी। मेरी भूंगी, सुन, अबकी और चली जा। (हंसकर) न आवें, तो गोद में उठा लाना।
भूंगी
नाक-भौं सिकोड़ते गयी, पर एक ही क्षण में
आकर बोली-अरे बहूजी, वह तो रो रहे हैं।
किसी ने कुछ कहा है क्या?
निर्मला
इस तरह चौककर उठी और दो-तीन पग आगे चली, मानो किसी माता ने
अपने बेटे के कुएं में गिर पड़ने की खबर पायी हो, फिर
वह ठिठक गयी और भूंगी से बोली-रो रहे हैं? तूने पूछा नहीं क्यों रो रहे हैं?
भूंगी- नहीं बहूजी, यह तो मैंने नहीं पूछा। झूठ क्यों बोलूं?
वह
रो रहे हैं। इस निस्तबध रात्रि में अकेले बैठै हुए वह रो रहे हैं। माता की याद आयी
होगी? कैसे जाकर उन्हें
समझाऊं? हाय, कैसे समझाऊं? यहां तो छींकते नाक
कटती है। ईश्वर, तुम साक्षी हो अगर
मैंने उन्हें भूल से भी कुछ कहा हो, तो वह मेरे गे आये।
मैं क्या करुं? वह दिल में समझते
होंगे कि इसी ने पिताजी से मेरी शिकायत की होगी। कैसे विश्वास दिलाऊं कि मैंने कभी
तुम्हारे विरुद्ध एक शब्द भी मुंह से नहीं निकाला? अगर मैं ऐसे देवकुमार के-से चरित्र
रखने वाले युवक का बुरा चेतूं, तो मुझसे बढ़कर
राक्षसी संसार में न होगी।
निर्मला
देखती थी कि मंसाराम का स्वास्थ्य दिन-दिन बिगड़ता जाता है, वह दिन-दिन दुर्बल होता जाता है, उसके मुख की निर्मल कांति दिन-दिन मलिन
होती जाती है, उसका सहास बदन
संकुचित होता जाता है। इसका कारण भी उससे छिपा न था, पर
वह इस विषय में अपने स्वामी से कुछ न कह सकती थी। यह सब देख-देखकर उसका हृदय
विदीर्ण होता रहता था, पर उसकी जबान न खुल
सकती थी। वह कभी-कभी मन में झुंझलाती कि मंसाराम क्यों जरा-सी बात पर इतना क्षोभ
करता है? क्या इनके आवारा
कहने से वह आवारा हो गया?
मेरी और बात है, एक जरा-सा शक मेरा
सर्वनाश कर सकता है, पर उसे ऐसी बातों की
इतनी क्या परवाह?
|
उ
|
सके जी में प्रबल इच्छा हुई कि चलकर
उन्हें चुप कराऊं और लाकर खाना खिला दूं। बेचारे रात-भर भूखे पड़े रहेंगे। हाय।
मैं इस उपद्रव की जड़ हूं। मेरे आने के पहले इस घर में शांति का राज्य था। पिता
बालकों पर जान देता था, बालक पिता को प्यार
करते थे। मेरे आते ही सारी बाधाएं आ खड़ी हुईं। इनका अंत क्या होगा? भगवान् ही जाने।
भगवान् मुझे मौत भी नहीं देते। बेचारा अकेले भूखों पड़ा है। उस वक्त भी मुंह जुठा
करके उठ गया था। और उसका आहार ही क्या है, जितना वह खाता है, उतना तो साल-दो-साल के बच्चे खा जाते
हैं।
निर्मला
चली। पति की इच्छा के विरुद्ध चली। जो नाते में उसका पुत्र होता था, उसी को मनाने जाते उसका हृदय कांप रहा
था। उसने पहले रुक्मिणी के कमरे की ओर देखा,
वह
भोजन करके बेखबर सो रही थीं, फिर बाहर कमरे की ओर
गयी। वहां सन्नाटा था। मुंशी अभी न आये थे। यह सब देख-भालकर वह मंसाराम के कमरे के
सामने जा पहुंची। कमरा खुला हुआ था, मंसाराम एक पुस्तक
सामने रखे मेज पर सिर झुकाये बैठा हुआ था, मानो शोक और चिन्ता
की सजीव मूर्ति हो। निर्मला ने पुकारना चाहा पर उसके कंठ से आवाज़ न निकली।
सहसा
मंसाराम ने सिर उठाकर द्वार की ओर देखा। निर्मला को देखकर अंधेरे में पहचान न सका। चौंककर बोला-कौन?
निर्मला
ने कांपते हुए स्वर में कहा-मैं तो हूं। भोजन करने क्यों नहीं चल रहे हो? कितनी रात गयी।
मंसाराम
ने मुंह फेरकर कहा-मुझे भूख नहीं है।
निर्मला-यह
तो मैं तीन बार भूंगी से सुन चुकी हूं।
मंसाराम-तो
चौथी बार मेरे मुंह से सुन लीजिए।
निर्मला-शाम
को भी तो कुछ नहीं खाया था, भूख क्यों नहीं लगी?
मंसाराम
ने व्यंग्य की हंसी हंसकर कहा-बहुत भूख लगेगी,
तो
आयेग कहां से?
यह
कहते-कहते मंसाराम ने कमरे का द्वार बंद करना चाहा, लेकिन
निर्मला किवाड़ों को हटाकर कमरे में चली आयी और मंसाराम का हाथ पकड़ सजल नेत्रों
से विनय-मधुर स्वर में बोली-मेरे कहने से चलकर थोड़ा-सा खा लो। तुम न खाओगे, तो मैं भी जाकर सो रहूंगी। दो ही कौर खा
लेना। क्या मुझे रात-भर भूखों मारना चाहते हो?
मंसाराम
सोच में पड़ गया। अभी भोजन नहीं किया, मेरे ही इंतजार में
बैठी रहीं। यह स्नेह, वात्सल्य और विनय की
देवी हैं या ईर्ष्या और अमंगल की मायाविनी मूर्ति? उसे अपनी माता का स्मरण हो आया। जब वह
रुठ जाता था, तो वे भी इसी तरह
मनाने आ करती थीं और जब तक वह न जाता था, वहां से न उठती थीं।
वह इस विनय को अस्वीकार न कर सका। बोला-मेरे लिए आपको इतना कष्ट हुआ, इसका मुझे खेद है। मैं जानता कि आप मेरे
इंतजार में भूखी बैठी हैं, तो तभी खा आया होता।
निर्मला ने
तिरस्कार-भाव से कहा-यह तुम कैसे समझ सकते थे कि तुम भूखे रहोगे और मैं खाकर सो
रहूंगी? क्या विमाता का नाता
होने से ही मैं ऐसी स्वार्थिनी हो जाऊंगी?
सहसा
मर्दाने कमरे में मुंशीजी के खांसने की आवाज आयी। ऐसा मालूम हुआ कि वह मंसाराम के
कमरे की ओर आ रहे हैं। निर्मला के चेहरे का रंग उड़ गया। वह तुरंत कमरे से निकल
गयी और भीतर जाने का मौका न पाकर कठोर स्वर में बोली-मैं लौंडी नहीं हूं कि इतनी
रात तक किसी के लिए रसोई के द्वार पर बैठी रहूं। जिसे न खाना हो, वह पहले ही कह दिया करे।
मुंशीजी
ने निर्मला को वहां खड़े देखा। यह अनर्थ। यह यहां क्या करने आ गयी? बोले-यहां क्या कर
रही हो?
निर्मला
ने कर्कश स्वर में कहा-कर क्या रही हूं, अपने भाग्य को रो रही
हूं। बस, सारी बुराइयों की जड़
मैं ही हूं। कोई इधर रुठा है, कोई उधर मुंह फुलाये
खड़ा है। किस-किस को मनाऊं और कहां तक मनाऊं।
मुंशीजी
कुछ चकित होकर बोले-बात क्या है?
निर्मला-भोजन
करने नहीं जाते और क्या बात है?
दस दफे महरी को भे, आखिर आप दौड़ी आयी।
इन्हें तो इतना कह देना आसान है, मुझे भूख नहीं है, यहां तो घर भर की लौंडी हूं, सारी दुनिया मुंह में कालिख पोतने को
तैयार। किसी को भूख न हो, पर कहने वालों को यह
कहने से कौन रोकेगा कि पिशाचिनी किसी को खाना नहीं देती।
मुंशीजी
ने मंसाराम से कहा-खाना क्यों नहीं खा लेते जी? जानते हो क्या वक्त है?
मंसाराम
स्त्म्भित-सा खड़ा था। उसके सामने एक ऐसा रहस्य हो रहा था, जिसका मर्म वह कुछ भी न समझ सकताथा। जिन
नेत्रों में एक क्षण पहले विनय के आंसू भरे हुए थे, उनमें
अकस्मात् ईर्ष्या की ज्वाला कहां से आ गयी? जिन अधरों से एक
क्षण पहले सुधा-वृष्टि हो रही थी, उनमें से विष प्रवाह
क्यों होने लगा? उसी अर्ध चेतना की
दशा में बोला-मुझे भूख नहीं है।
मुंशीजी
ने घुड़ककर कहा-क्यों भूख नहीं है? भूख नहीं थी, तो शाम को क्यों न
कहला दिया? तुम्हारी भूख के
इंतजार में कौन सारी रात बैठा रहे? तुममें पहले तो यह आदत न थी। रुठना कब से सीख लिया? जाकर खा लो।
मंसाराम-जी
नहीं, मुझे जरा भी भूख नहीं
है।
तोताराम-ने
दांत पीसकर कहा-अच्छी बात है, जब भूख लगे तब खाना।
यह कहते हुए एवह अंदर चले गये। निर्मला भी उनके पीछे ही चली गयी। मुंशीजी तो लेटने
चले गये, उसने जाकर रसोई उठा
दी और कुल्लाकर, पान खा मुस्कराती हुई
आ पहुंची। मुंशीजी ने पूछा-खाना खा लिया न?
निर्मला-क्या
करती, किसी के लिए अन्न-जल
छोड़ दूंगी?
मुंशीजी-इसे
न जाने क्या हो गया है, कुछ समझ में नहीं आता? दिन-दिन घुलता चला
जाता है, दिन भर उसी कमरे में
पड़ा रहता है।
निर्मला
कुछ न बोली। वह चिंता के अपार सागर में डुबकियां खा रही थी। मंसाराम ने मेरे
भाव-परिवर्तन को देखकर दिल में क्या-क्या समझा होगा? क्या उसके मन में यह प्रश्न उठा होगा
कि पिताजी को देखते ही इसकी त्योरियं क्यों बदल गयीं? इसका कारण भी क्या
उसकी समझ में आ गया होगा?
बेचारा खाने आ रहा था, तब तक यह महाशय न
जाने कहां से फट पड़े?
इस रहस्य को उसे कैसे समझाऊं समझाना संभव भी है? मैं किस विपत्ति में फंस गयी?
सवेरे
वह उठकर घर के काम-धंधे में लगी। सहसा नौ बजे भूंगी ने आकर कहा-मंसा बाबू तो अपने
कागज-पत्तर सब इक्के पर लाद रहे हैं।
भूंगी-मैंने
पूछा तो बोले, अब स्कूल में ही
रहूंगा।
मंसाराम
प्रात:काल उठकर अपने स्कूल के हेडमास्टर साहब के पास गया था और अपने रहने का
प्रबंध कर आया था। हेडमास्टर साहब ने पहले तो कहा-यहां जगह नहीं है, तुमसे पहले के कितने ही लड़कों के
प्रार्थना-पत्र पडे हुए हैं, लेकिन जब मंसाराम ने
कहा-मुझे जगह न मिलेगी, तो कदाचित् मेरा
पढ़ना न हो सके और मैं इम्तहान में शरीक न हो सकूं, तो
हेडमास्टर साहब को हार माननी पड़ी। मंसाराम के प्रथम श्रेणी में पास होने की आशा
थी। अध्यापकों को विश्वास था कि वह उस शाला की कीर्ति को उज्जवल करेगा। हेडमास्टर
साहब ऐसे लड़कों को कैसे छोड़ सकते थे? उन्होने अपने दफ्तर का कमरा खाली करा दिया। इसीलिए मंसाराम
वहां से आते ही अपना सामान इक्के पर लादने लगा।
मुंशीजी
ने कहा-अभी ऐसी क्या जल्दी है?
दो-चार दिन में चले जाना। मैं चाहता हूं, तुम्हारे लिए कोई
अच्छा सा रसोइया ठीक कर दूं।
मंसाराम-वहां
का रसोइया बहुत अच्छा भोजन पकाता है।
मुंशीजी-अपने
स्वास्थ्य का ध्यान रखना। ऐसा न हो कि पढ़ने के पीछे स्वास्थ्य खो बैठो।
मंसाराम-वहां
नौ बजे के बाद कोई पढ़ने नहीं पाता और सबको नियम के साथ खेलना पड़ता है।
मुंशी
जी-बिस्तर क्यों छोड़ देते हो?
सोओगे किस पर?
मंसाराम-कंबल
लिए जाता हूं। बिस्तर जरुरत नहीं।
मुंशी
जी-कहार जब तक तुम्हारा सामान रख रहा है, जाकर कुछ खा लो। रात
भी तो कुछ नहीं खाया था।
मंसाराम-वहीं खा
लूंगा। रसोइये से भोजन बनाने को कह आया हूं यहां खाने लगूंगा तो देर होगी।
घर
में जियाराम और सियाराम भी भाई के साथ जाने के जिद कर रहे थे निर्मला उन दोनों के
बहला रही थी-बेटा, वहां छोटे नहीं रहते, सब काम अपने ही हाथ से करना पड़ता है।
एकाएक
रुक्मिणी ने आकर कहा-तुम्हारा वज्र का हृदय है,
महारान।
लड़के ने रात भी कुछ नहीं खाया, इस वक्त भी बिना
खाय-पीये चला जा रहा है और तुम लड़को के लिए बातें कर रही हो? उसको तुम जानती नहीं
हो। यह समझ लो कि वह स्कूल नहीं जा रहा है,
बनवास
ले रहा है, लौटकर फिर न आयेगा।
यह उन लड़कों में नहीं है, जो खेल में मार भूल
जाते हैं। बात उसके दिल पर पत्थर की लकीर हो जाती है।
निर्मला
ने कातर स्वर में कहा-क्या करुं, दीदीजी? वह किसी की सुनते ही
नहीं। आप जरा जाकर बुला लें। आपके बुलाने से आ जायेंगे।
रुक्मिणी-
आखिर हुआ क्या, जिस पर भागा जाता है? घर से उसका जी कभ
उचाट न होता था। उसे तो अपने घर के सिवा और कहीं अच्छा ही न लगता था। तुम्हीं ने
उसे कुछ कहा होगा, या उसकी कुछ शिकायत
की होगी। क्यों अपने लिए कांटे बो रही हो? रानी, घर को मिट्टी में
मिलाकर चैन से न बैठने पाओगी।
निर्मला
ने रोकर कहा-मैंने उन्हें कुछ कहा हो, तो मेरी जबान कट
जाये। हां, सौतेली मां होने के
कारण बदनाम तो हूं ही। आपके हाथ जोड़ती हूं जरा जाकर उन्हें बुला लाइये।
रुक्मिणी
ने तीव्र स्वर में कहा- तुम क्यों नहीं बुला लातीं? क्या छोटी हो जाओगी? अपना होता, तो क्या इसी तरह बैठी रहती?
निर्मला की दशा उस पंखहीन पक्षी की तरह हो रही
थी, जो सर्प को अपनी ओर
आते देख कर उड़ना चाहता है, पर उड़ नहीं सकता, उछलता है और गिर पड़ता है, पंख फड़फड़ाकर रह जाता है। उसका हृदय
अंदर ही अंदर तड़प रहा था, पर बाहर न जा सकती
थी।
इतने
में दोनों लड़के आकर बोले-भैयाजी चले गये।
निर्मला
मूर्तिवत् खड़ी रही, मानो संज्ञाहीन हो
गयी हो। चले गये? घर में आये तक नहीं, मुझसे मिले तक नहीं चले गये। मुझसे इतनी
घृणा। मैं उनकी कोई न सही, उनकी बुआ तो थीं।
उनसे तो मिलने आना चाहिए था?
मैं यहां थी न। अंदर कैसे कदम रखते? मैं देख लेती न। इसीलिए चले गये।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)